मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

Shriramachandra kripalu bhaju man haran bhavabhai darunam -
Navakanja-loochana, kanjamukhqa, kara kanja pada kanjarunam-
Shriramachandra kripalu bhaju man haran bhavabhai darunam
Kandarpa aganita amit chavi nve neel-neerada sundaram-
Pata peet manahu tadita ruchi shuchi noimi, janaka sutavaram

Bhaju deenbandhu dinesh danav-daitya-vansha-nikandanam-
Raghunand anandakand koshalachand dasharath-nanadanam-

Sira mukuta kundala tilaka charu udaru anga vibhushanam-
Aajaanubhuja shara-chaapa-dhara, sangrama-jita-khara dushanam-

Iti vadati tulasidasa shankara-sesha-muni-mana-ranjanam-
Mama hridai kanja-nivaasa kuru, kaamaadi khala-dala-ganjanam-

Manu jaahni raacheu milihi so baru sahaj sundar savaro-
Karuna nidhaan sujaan seelu sanehu jaanat raavaro-

Yahi bhanti gouri asees suni sia sahit hian harshin ali-
Tulsi bhavanih pooji puni puni mudit man mandir chali-


परमात्मा के संग से योग और संसार के संग से भोग होता है।
सुख की इच्छा आशा और भोग ये तीनो सम्पूर्ण दुखो के कारण है।
सुख की इच्छा का त्याग कराने के लिये ही दु:ख आता हैं।
शरीर को मै और मेरा मानना प्रमाद है। प्रमाद ही मृत्यु है।
नाशवान् को महत्व देना ही बंधन हैं।
नाशवान की चाहना छोड़ने से अविनाशी तत्व की प्राप्ति होती है।
शरीर संसार से अपना सम्बंध मानना कुसंग है।
आप भगवान को नही देखते पर भगवान आपको निरन्तर देख रहे हैं।
ऐसा होना चाहिये ऐसा नही होना चाहिए इसी मे सब दुख भरे हुए हैं।
अपने स्वभाव को शुद्व बनाने के समान कोई उत्रति नही हैं।
अच्छाईका अभिमान बुराई की जड़ है।
मिटने वाली चीज एक क्षण भी टिकने वाली नही होती।
शरीर को मैं मेरा मानने से तरह तरह के अनन्त दुख आते है।
दूसरो के दोष देखने से न हमारा भला होता है न दूसरो का ।
नाशवान की दासता ही अविनाशी के सम्मुख नही होने देती ।